Wednesday, 11 January 2012

आत्मा – आपकी शक्ति


कई बार जीवन में कुछ ऐसा घटित हो जाता है कि मन बार-बार पूछने लगता है, मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? जो धृष्टता मैंने की ही नहीं, उसका आरोप मुझे क्यों झेलना पड़ रहा है? इत्यादि – इत्यादि| जिसक जीवन निष्पाप है, जो पाप मुक्त है, जिसकी वृत्तियाँ शुभ हैं, सात्विक हैं, उन पर झूठा कलंक लगने से मानसिक आघात लगना स्वभाविक है| पर ध्यान से देखें तो जो स्थिति आज हमारी है, वही स्थिति दुनिया में बहुत से लोगों की रह चुकी है| उनकी भी, जो महान थे|

समाज में कुछ लोग उन्हें मानने वाले थे, पर बहुत से उन्हें न मानने वाले भी थे, अपमानित करने वाले भी थे| पर वे धैर्य और मन के संतुलन के साथ, सब सहन करते रहे| वे प्रतिकूल परिस्थितियों में भी संतुलित रहे| ‘गीता’ में कहा गया है, “जो कामनाओं का त्याग करता है, आत्मतुष्ट रहता है, दुःख के समय उद्वेगरहित, सुख के समय स्पृहारहित है, राग, भय, क्रोध, जिसके वश में पूरी तरह है, शुभ-अशुभ व्यवहार से न प्रसन्न होता है, न दुखी, वही सुखी रह सकता है|” निराधार दुःख सहने वाले, हम या आप, अकेले नहीं हैं| सीता पर व्यर्थ कलंक लगा, उन्हें गर्भावस्था में वनवास की यातना झेलनी पड़ी| कलंक लगाने वाला मुर्ख धोबी था, पर सीता पवित्र थीं| उन्हें विश्वास था, एक दिन सच साबित होगा कि वे निष्कलंक हैं, वे स्थिरप्रज्ञ रहीं, एक दिन यही हुआ, जीत हुई पुण्य की, पाप हार गया|

ईशा मसीह का चरित्र, उद्देश्य और कार्य, अत्यंत उच्च थे, वे लोगों में सदाचार वृत्ति को फ़ैलाने का कार्य कर रहे थे, किन्तु कुछ कुसंकारी लोगों को अच्छे उद्देश्य व अच्छे संस्कार, अच्छे नहीं लगे| उन्होंने विरोध करना शुरू किया| ईशा मसीह को मृत्युदंड मिला| सूली पर लटका दिया गया उन्हें| फिर भी ईशा मसीह ने कहा, “हे प्रभु! इन्हें क्षमा करना! ये अज्ञानी हैं| इन्हें क्षमा करना, इन्हें पता नहीं है कि ये क्या कर रहे हैं?”

ईशा की आत्मा साफ़ थी, इसलिए उन्होंने क्रोध के जगह क्षमा करना उचित समझा| क्षमा से उन्होंने अपने मन का संतुलन कायम रखा|

सधाक की कसौटी


एक बार एक युवक ने महात्मा से कहा – “मुझे आत्म-साक्षात्कार का मार्ग बताइए!”
महात्मा ने कहा – “आत्मा-साक्षात्कार का मार्ग बड़ा कठिन है| उस पर चलने के लिए साधक को कई कठिनाइयों से होकर गुजरना पड़ता है|”
युवक बोला - “मैं तैयार हूँ| आप बताएं!”
महात्मा – “एकांत स्थान में बैठकर एक वर्ष तक गायत्री मन्त्र का जाप करो! इस दौरान ना किसी से बात करना ना ही कोई मतलब रखना! एक साल पूरा होने पर मुझसे मिलने आना!”

एक साल बीतने पर महात्मा अपने सफाई करने वाली से बोले – “आज मेरा शिष्य आने वाला है| तुम उसके ऊपर झाड़ू से खूब धुल झाड़ना!”

हुआ भी ऐसा ही| जैसे ही एक साल बीतने पर, वह युवक महात्मा से मिलने आया, झाड़ू मारने वाली जोर-जोर से उसे झाड़ू मरने लगी| गुस्से में वह युवक उसे मारने दौड़ा| झाड़ू मारने वाली दौड़ कर भाग गई| थोड़ी देर बाद, वह युवक नहा-धोकर महात्मा के सामने आया|

महात्मा – “तुम तो सांप की तरह काटते हो| जाओ एक साल और साधना करो!”

युवक बहुत क्रोधित हुआ, पर उसके सामने और कोई चारा नहीं था| वह चुपचाप चला गया|

एक साल बीतने पर महात्मा झाड़ू मारने वाली से बोले, “जैसे ही वह युवक आये, तुम उसके शरीर से झाड़ू सटा देना!”

जब युवक एक और साल बीतने पर महात्मा के समीप आया तो झाड़ू मारने वाली ने उसके शरीर से झाड़ू सटा दिया| युवक ने गुस्से में आकर उसे गालियाँ दी| जब वह नहा-धोकर महात्मा के समीप आया तो महात्मा उससे बोले कि अब तुम सांप कि तरह काटते तो नहीं हो लेकिन फुंफकारते जरुर हो| जाओ एक वर्ष और साधना करो| युवक चला गया और इस तरह तीसरा साल भी बीत गया| महात्मा ने झाड़ू मारने वाली से कहा कि इस बार जैसे ही वह युवक आये, तुम उसके ऊपर कूड़े से भरी बाल्टी डाल देना|

झाड़ू मारने वाली ने ऐसा ही किया, लेकिन इस बार युवक को क्रोध नहीं आया|
उसने हाथ जोड़कर कहा – “माता! तुम महान हो| तीन साल से तुम मेरे दुर्गुणों को निकलने का प्रयास कर रही हो, मैं तुम्हारे उपकार को कभी नहीं भूल सकता| इसी तरह तुम मेरे उद्धार का प्रयास करते रहना|”

यह कहकर वह युवक नहाने चला गया| जब नहा कर वह महात्मा के समक्ष आया, तो महात्मा ने उससे मुस्कुराते हुए कहा – “अब तुम आत्म-साक्षात्कार के योग्य हो गए हो|”

Tuesday, 10 January 2012

व्यावहारिक ज्ञान



एक बार कुछ विद्वान नाव से नदी पार कर रहे थे| उन्होंने नाविक से पूछा – “क्या तुम पढ़ना-लिखना जानते हो?” नाविक ने जवाब दिया, “नहीं! मुझे पढ़ना-लिखना नहीं आता| मुझे सिर्फ नाव चलाना आता है|” दूसरे विद्वान ने कहा, “तब तो तुम्हारी एक चौथाई जिंदगी व्यर्थ गुजर गई| क्या तुम भूगोल जानते हो? बताओ हिमालय किस दिशा में है?” नाविक ने कहा कि वो भूगोल भी नहीं जनता है| इस पर एक विद्वान बोला, “तब तो तुम्हारी आधी जिंदगी बेकार चली गई| क्या तुम्हे इतिहास का कुछ ज्ञान है? बताओ गौतम बुद्ध का जन्म कहाँ हुआ था?” नाविक ने दुहराया, “मुझे यह भी नहीं मालूम|” इसपर एक विद्वान बोला, “तब तो तुम्हारी तीन चौथाई जिंदगी बेकार चली गई|”

इतने में नदी में तूफ़ान आ गया| लहरों पर नाव डगमगाने लगी| बड़ी मुश्किल से नाविक नाव को संभाले था, लेकिन तूफ़ान और भी बढ़ गया, तब नाविक ने विदानों से पूछा, “क्या आप लोगों को तैरना आता है?” सभी ने एक साथ जवाब दिया. “नहीं! हमें तैरना नहीं आता है|”
नाविक ने कहा, “आप तैरना नहीं जानते हैं? तब तो आपकी पूरी जिंदगी बेकार चली जायेगी|”

और हुआ भी ऐसा ही नाव तूफ़ान नहीं झेल पाई और नदी में डूब गई, साथ ही सभी विद्वान भी डूब गए| परन्तु नाविक तैरता हुआ किनारे पहुँच गया| विद्वानों को जीवन के अंत में एहसास हुआ कि व्यावहारिक ज्ञान पुस्तकीय ज्ञान से कहीं श्रेष्ठ है|


यात्रियों से भरा जहाज समुद्र में जा रहा था| किसी कारणवस जहाज के तल में छेद हो गया और जहाज में पानी भरने लगा| यात्रियों में एक ज्ञानी भी बैठे थे, वे शांत भाव से बैठे सब देख रहे थे| यह देखकर एक यात्री उनसे बोला, “श्रीमान! आप अपने आवश्यक समान क्यों नहीं बाँध लेते, जहाज डूबने वाला है?” ज्ञानी पुरुष बोले, “मेरी आवश्यक वस्तुएं मेरे साथ हैं|”

पानी अधिक भरने के कारण, थोड़ी देर में जहाज डूबने लगा| सभी यात्री अपने आवश्यक समान के साथ समुद्र में कूद गए और तैरने लगे| लेकिन समान का बोझ वे ज्यादा देर तक नहीं ढो पाए| बोझ और थकान के कारण वे एक-एक करके के डूब गए| ज्ञानी पुरुष अच्छा तैराक थे और उन्होंने अपने शरीर से कोई वस्तु भी नहीं बाँध रखी थी| धीरे-धीरे वे तैरते हुए किनारे पहुँच गए| उनकी आवश्यक वस्तु – उनका ज्ञान, उनके साथ था|

Monday, 9 January 2012

विवेक


एक गाँव में एक किसान रहता था| एक बार उसे कुछ पैसों की जरुरत पड़ी| उसने अपने पड़ोसी से उधार माँगा, तो पड़ोसी ने कहा कि तुम्हारे पास इतना सुंदर घोड़ा है, उसे बेच दो, किसी के आगे हाथ क्यों पसार रहे हो? किसान ने उसकी सलाह मान ली| अगले दिन वह अपने बेटे के साथ घोड़ा बेचने निकला| पिता घोड़े पर बैठा और बेटा साथ-साथ चल रहा था|

रास्ते में कुछ लोग आ रहे थे| उनमे से एक ने कहा – “देखो कैसा बाप है! खुद घोड़े पर सवार होकर मजे से जा रहा है और बेटा पैदल चल रहा है|”

यह सुनकर किसान घोड़े से उतर गया और बेटे को घोड़े पर बैठाकर स्वयं पैदल चलने लगा|

कुछ दूर जाने पर सामने से कुछ महिलाएँ आ रहीं थीं| उनमे से एक ने कहा – “कैसा कलयुग आ गया है? बेटा घोड़े पर और बूढा बाप पैदल?”

उसकी बात सुनकर, पिता बोले, “शायद हम गलती कर रहे हैं| हम दोनों पैदल ही चलेंगे|” वे घोड़े की लगाम पकड़े, पैदल चलने लगे| इतने में एक राहगीर बोला, “इन मूर्खों को देखो घोड़ा होने पर भी, दोनों पैदल चल रहे हैं|”

उसकी बात सुनकर, अब दोनों घोड़े पर सवार हो गए| कुछ दूर जाने पर भारी वजन के कारण घोड़ा खड़ा हो गया| इतने में एक मुसाफिर ने कहा, “कितने निर्दयी हैं कि एक ही घोड़े पर दोनों सवार हैं|”

दोनों को पीछे-पीछे एक महात्मा जी भी आ रहे थे, जो शुरू से सारा तमाशा देख रहे थे| उन्होंने किसान के पास जा कर कहा, “भाई इस दुनिया में कोई भी सबको संतुष्ट नहीं कर सकता, इसलिए तुम्हें जो करना है, अपने मन से करो! इसलिए कहा गया है कि सुनो सबकी, पर करो अपने मन की!”

यह सुनकर किसान अपने बेटे से बोला, “बेटा महात्मा जी ठीक कह रहे हैं| चलो वापस गाँव चलते हैं, अब घोड़ा नहीं बिकेगा| हम दोनों मेहनत करके धन का जुगाड़ करेंगे|”

दोनों घोड़ा लेकर अपने गाँव चले गए|

देश की आत्मा


यह घटना उस समय की है, जब फ़्रांस दुनिया का सबसे ताकतवर देश था| वहां के सम्राट नेपोलियन एक बार यात्रा पर निकले| चूँकि यह उनका निजी सफ़र था, इसलिए वे अपने एक महिला दोस्त के यहाँ ठहरे| महिला दोस्त ने नपोलियन को कई रमणीक जगह दिखाए|

एक दिन नपोलियन ने कहा, “मैडम! आप अपने देश की खूबसूरती तो दिखा रहीं हैं, लेकिन यहाँ की असल जिंदगी भी तो दिखाओ! हमें वहां ले चलो, जहाँ कमजोर वर्ग के लोग रहते हैं!”

महिला दोस्त नपोलियन को पुराना पेरिस शहर घुमाने ले गई| वहां भी भारत की तरह संकरी गलियों में लोग रहते थे| एक उबर-खाबड़ संकरी गली से दोनों जा रहे थे कि सामने से एक मजदूर सर पर बोझ लिए आ निकला| गली इतनी पतली थी कि सामने से निकलना मुश्किल था| महिला दोस्त को यह बुरा लगा| उच्च कुल, धन और पद का गर्व तो उसे था ही, सबसे बड़ी बात यह थी कि वह इस समय सबसे ताकतवर देश के सम्राट के साथ चल रही थी| उसे क्रोध आ गया|

वह गुस्से में बोली, “दिखाई नहीं देता! तू अंधा है क्या? फ़ौरन वापस लौटो!”

उस गली में इतनी भी जगह नहीं थी कि वह मजदूर बोझ सहित आसानी से वापस लौटता| बड़ी मुश्किल से वह किसी तरह घूमने का प्रयास कर ही रहा था कि तभी नपोलियन तेजी से उस मजदूर के पास गए और बोले, “भाई! रुक जाओ!” और अपने दोस्त महिला का हाथ पकड़कर उसे किनारे ले गए और मजदूर से बोले, “अब तुम आराम से निकला जाओ!”



मजदूर आगे निकल गया| अपनी झेंप मिटाने के लिए महिला दोस्त बोली, “सम्राट! एक अदने से मजदूर के लिए, हमलोगों का इस तरह रास्ता छोड़ना ठीक नहीं है| यहाँ के लोग क्या समझेंगे?”

नपोलियन बोले, “मैडम! मजदूर देश की आत्मा होते हैं| उनकी मेहनत से ही देश तरक्की करता है, उनका सम्मान करना तो हमारा कर्तव्य बनता है, उनका तिरस्कार देश की अपेक्षा के बराबर है|”

महिला की समझ में यह बात आ गई कि फ़्रांस की तरक्की का क्या राज़ है|

Tuesday, 13 September 2011

ओ भारत के कर्मधार लोग! ज़रा बहुसंख्यक लोगों के जान की कीमत को समझने की कोशिश करो!

मेरा अनुभव मुझे बताता है, किसी भी समस्या के मूल कारण को ढूंढे बगैर, उसपर गहन विचार कर उसे दूर किये बगैर उसके समाधान की बात करना महज़ एक कोड़ी कल्पना होती है| मैं दृढ़ता पूर्वक यह कहना चाहता हूँ, हिंसा का रास्ता किसी धर्म में निहित नहीं है| जहाँ, कुछ धर्मों में अहिंसा का व्यवहार मनुष्य का आवश्यक कर्तव्य माना गया है, वहीँ कुछ धर्मों में अहंकार और परिस्थितियों के कारण से इसकी इजाजत भी दी गई है| जिस भी धर्म के नंबरदार यह सोचते हैं कि हिंसा से भलाई हो रही है तो यह भलाई केवल अस्थायी होती है, और इससे जो बुराई फैलती गई, आज वही स्थायी बनता चला गया| मेरा मानना है कि किसी भी लक्ष्य के पूर्ति में जिस सीमा तक हिंसा का सहारा लिया जायेगा उसी सीमा तक विफलता हाथ लगेगा| हालाँकि आज तक ज़ाहिर तौर पर उसका उल्टा भी देखने को मिलता रहा है| कोई भी संगठन या समूह, अगर यह समझती है कि हमारे धर्म में बाधक बनने वाले समूह, समाज या व्यक्ति को समाप्त कर देते हैं, तो मेरी मंजिल सामने होगी; यह विल्कुल असंभव है| इससे एक झूठी सुरक्षा का आभास हो सकता है पर यह सुरक्षा सिर्फ अल्प काल के लिए और अस्थायी ही होगी| इसलिए किसी भी समाज, समूह या व्यक्ति को समाप्त कर देने से समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सकता| हमें पता लगाने की कोशिश करनी चाहिए कि किन बातों के कारण वे ऐसा व्यवहार कर रहे हैं ताकि इलाज किया जा सके|



हिंसा या सशक्त विद्रोह पर विश्वास नहीं किया जा सकता| वे जिस बुराई को दूर करने के लिए उठते हैं, वे स्वयं उससे भी ज्यादा बुरे होते हैं| वे प्रतिशोध, अधैर्य और क्रोध के प्रतीक होते हैं| हिंसक उपचार से कोई स्थायी लाभ नहीं होता| आज हिंसा के सामने सिर्फ देखने और सुनने से लगता है कि हमारी सभ्य समाज बेबस है| लेकिन कानून कभी बेबस नहीं होता है|  यह बात सही है कि दुनियाँ में आज सबसे सक्रीय ताकत के रूप में हिंसा को देखा जा रहा है| लेकिन विश्व, राष्ट्र, परिवार, समाज का कल्याण अहिंसा के रास्ते पर ही चलकर हो सकता है| मेरी नज़र में दिल्ली जैसी हिंसा की घटना को कायरता का प्रदर्शन ही कहेंगे| सिर्फ मन में यह भ्रम पालकर की लोगों को मारकर हिंसा फैलाना असल में बदला है, यह उसका सबसे बड़ा अहंकार है|

एक बात और गौर से समझने की जरूत है| हिंसा, आतंकवाद या उग्रवाद दुनियाँ की सबसे जटिल समस्या बनी हुई है| दुनिया में कई ऐसे देश हैं जो हमसे ज्यादा आतंकवाद से पीड़ित हैं| दुनिया में बहुत थोड़े देश ऐसे भी हैं जिन्होंने अपनी एकता, संकल्प, सुरक्षा, निगरानी के कारण आतंकी हमलों को लगभग बहुत ही कम करने की सफल कोशिश की है| लेकिन इसके सबसे बड़े कारण हैं- सामाजिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, भाषा, क्षेत्रवाद, जातिवाद, गरीबी, असमानता, भूख, जैसी व्यवस्था/समस्या आर्थिक संपन्न लोकतान्त्रिक देशों में नहीं के बराबर देखने को मिलती है|

भारत इन समस्याओं के साथ-साथ भ्रष्टाचार, ड्रग्स, तस्करी, नक्सल, काला धन, आंतरिक संक्रमण- जैसे धार्मिक, जातिवाद, क्षेत्रवाद सरीखे हिंसा से बहुत अत्यधिक रूप से ग्रसित है| दुनियाँ की उभरती हुई महाशक्ति होने के वाबजूद आतंरिक, सामाजिक, आर्थिक और हिंसा जैसी व्यवस्था के कारण अपनी सुरक्षा निगरानी को बहुत अधिक मजबूत और व्यापक नहीं कर पाती है| कोई कहता है कि हमारी हुकूमत बहरी, अंधी, और गूंगी है| कोई कहता है कि हमारी ख़ुफ़िया एजेंसी, सुरक्षा तंत्र का इंतजाम काफी कमजोर और अव्यवस्थित है| मेरा मानना है कि यदि धर्म, कौम, जात या देश के लिए मौत के जज्बे को लेकर कोई व्यक्ति जन्नत की अवधारणा को लेकर यदि मरने या मारने को तैयार हो जाता है, तो कोई भी ख़ुफ़िया तंत्र या कठोर कानून ऐसे हिंसात्मक घटना को घटने से नहीं रोक सकता| अमेरिका या अन्य कुछ देशों की तुलना हमारे देश से नहीं की जा सकती| हमारी धर्मनिर्पेक्ष सिद्धांत, भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक स्थिति हमें अपने मूल और सकरात्मक विचारधार से अलग नहीं होनी देती|

भारत हमेशा सकारात्मक नजरिया रखते हुए, एक प्रगतिशील विचारधारा के साथ ‘सर्व धर्म संभाव’ की बात करती रही| यह कहना कि पढ़े लिखे लोग और संपन्न लोगों को आतंकवाद के द्वारा निशाना बनाया जाता है, यह बिलकुल ही गलत है| आतंकवादी हमला होते ही जिस तरीके से लोग हाय-तौबा मचाने लगते हैं, कोई सरकार को गाली, तो कोई लोकतंत्र को गाली, कोई हिंदू को तो कोई मुस्लमान को गाली देना शुरू कर देते हैं| कोई कहता है आतंकवादियों को दामाद के तरह पाला जाता है| पक्ष और विपक्ष वोट के लिए हिंदू और मुस्लमान की बात शुरू कर देते हैं| आतंकवाद को जायज कभी नहीं ठहराया जा सकता| लेकिन आतंकवाद को रोकने के लिए सम्पूर्ण देश को विश्वास में लेना होगा| हमारे लेखकों को २७ मई को किये गए आतंकवादी घटने की तारीख तो याद रहती है, लेकिन कभी आतंरिक बुराइयों जिनके कारण हमारी समाज खोखली और कमजोर होती जा रही है, इसकी यादें और तारीख हमारे लेखकों और कॉलमिस्ट को याद नहीं आती|

चीन अपने सामाजिक और राजनितिक परिस्थिति के कारण एक स्वर में किसी आतंकवादी या राष्ट्रद्रोही को फांसी देनें के लिए खड़ी हो जाती है, लेकिन हमारा सर्व धर्म संभाव का दर्शन मानने वाला देश, हमारा संघीय ढांचा और विभिन्न राजनितिक पार्टियां अपनी सामाजिक और राजनितिक व्यवस्था के कारण शायद बहुत कम ही एक साथ एक स्वर में खड़े हो पाए हैं| तमिलनाडु के विधानसभ में राजीव गाँधी के हत्यारों के फांसी की सजा माफ करने का प्रस्ताव सर्वसमत्ति से लिया गया| पक्ष और विपक्ष दोनों एक सुर में बोलने लगे| क्षेत्रीय भावनाओं की होड़ में सारे भेद मिटा दिए, देश का सवाल फिर पीछे चला गया|

व्यक्तिगत तौर पर मेरी संवेदना भी इस बात का आग्रही है कि उसे माफ किया जाना चाहिए, लेकिन इस तरह की परिपाटी क्या देश के हित में सही है? अब जरा पंजाब की ओर नज़र डालिए| जहाँ सरकार चला रही है अकाली दल| देवेन्द्र सिंह भुल्लर को माफ करने के लिए अभियान चला रहा है और सरकार में शामिल भाजपा की बोलती बंद है| यह वही भाजपा है जो अफज़ल गुरु को फांसी ना देने पर रात-दिन शोर मचाता रहता है| जम्मू के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने ट्विटर के जरिये कहा है कि यदि तमिलनाडु की तरह ही जम्मू कश्मीर अफज़ल गुरु की फांसी माफ करने का प्रस्ताव पास करे तो क्या लोग ऐसे ही खामोश रहेंगे? चाहे उमर जितना भी खामोश हो जाएँ, लेकिन मामला वहां भी कम गरम नहीं है|

पी.डी.पी. पहले से ही अफज़ल गुरु की फांसी की सजा माफ करने की मांग कर रही है| अलगाववादी नेता भी अफज़ल की फांसी के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं| निर्दलीय विधायक राशिक ने माफ़ी की मांग करते हुए विधानसभा में निजी प्रस्ताव पेश कर दिया है| कहीं ऐसा तो नहीं कि यह विधानसभ भी एक स्वर में माफ़ी की प्रस्ताव पास कर दे? क्या आतंकवाद से निपटने की सबसे बड़ी जिम्मेवारी सिर्फ कांग्रेस की है, क्योंकि वह केन्द्र में सरकार चला रही है| ऐसा क्यों कि देश में होने वाला हर धमाका, जिसकी सरकार होती है, उसी पर सवाल खड़ा करता है? कोई भुल्लर के इस मुद्दे पर खामोश हो जाता है तो कोई राजीव के हत्यारे के सवाल पर| किसी धमाके के पीछे जब हिंदू संगठनों का नाम आता है तो उसके पक्ष में बड़ी पार्टी खड़ी हो जाती है तो कोई पार्टी विपक्ष में खड़ी हो जाती है|

स्वामी या शिवानंद का नाम समझौता एक्सप्रेस में हुए धमाके में आया तो भाजपा ने तुरंत इसे हिंदुत्व को बदनाम करने की साजिश करार दे दी| वहीँ मक्का मस्जिद में हुए धमाकों को लेकर गिरफ्तार हुई साध्वी प्रज्ञा से मिलने भाजपा के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह और कई वरिष्ठ नेता जेल जा पहुंचे| आखिर ऐसा क्यों होता है भाजपा के लिए आतंकी मामला तभी गंभीर होता है जब आरोप इस्लामी संगठनों पर होता है, किसी को हिंदूओं को बचाने की फ़िक्र है तो किसी को मुस्लमान और सिक्खों को बचाने की फ़िक्र है| वह दिन कब आयेगा जब इंसानियत, मानवता, हमारी लोकतान्त्रिक मर्यादा और देश को बचाने की फ़िक्र होगी| किसी भी तरह के आतंरिक और बाह्य हिंसा की कार्रवाई को मानवीय संवेदना पर हमला माना जायेगा| उस दिन से ही धीरे-धीरे तस्वीर बदलने लगेगी| लेकिन आगे मैं व्यक्तिगत तौर पर यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि  देश की क्षेत्रीय पार्टी हो या बड़ी राष्ट्रीय पार्टी, बड़ी जात हो या छोटी जात, हिन्दी भाषी हो या मराठी भाषी, बंगला भाषी हो या उड़िया भाषी, कन्नड़ भाषी हो या गुजरती भाषी, नेता हो या जनता, अपने-अपने नफा और नुकसान को भूलकर किसी भी परिस्थिति में मानवता और देश के बारे में शायद ही सोच पाएंगे|

राष्ट्र को अपनी जागीर मानने वाले मध्य वर्गीय लोगों के लिए नैतिकता बहुत दिलचस्प होती है| पढ़े-लिखे सभ्य समाज, मध्य वर्ग हमेशा से मानती आई है कि हम लोग ही राष्ट्र हैं और राष्ट्र ही मध्य वर्ग है, इसलिए तो जब कभी बाहरी आतंकवादी के हमले में १०, १५, २० या २५ लोग मारे जाते हैं तो यह कह कर के दुनिया में प्रचारित किया जाता है कि सिर्फ बाह्य आतंकवाद ही सबसे बड़ा खतरा है| मानो आंतरिक आतंकवाद, हिंसा, बुराई हमारी बपौती संपत्ति बन चुकी हो| ऐसे पढ़े-लिखे लोग अपने अहंकार के कारण दो तरह के विचारधार को कैसे पाल सकते हैं और सिर्फ उन्ही की विचारधारा सर्वमान्य और सर्वोत्तम कैसे हो सकता है? सोचने की जरूरत है कि आतंकवाद, भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्से से उबल रहा सभ्य समाज या मध्य वर्ग तो फिर इसी देश में हजारों किसानों की आत्महत्या पर उनका गुस्सा क्यों नहीं उबलता?

महाराष्ट्र के मेला घाट नामक इलाके में हर दिन कई बच्चे भूख से मरते हैं| क्यों आपका खून नहीं खौलता है? याद रखिए क्रिकेट विश्व कप जीत कर अपना राष्ट्र गौरव पुनर्स्थापित करने में सफल रहे मध्यवर्ग का भारत वही भारत है जिसके कुल बच्चों में से ४० % कुपोषित हैं| आज भी जहाँ प्रसव के समय माँओं की होने वाली मृत्यु का दर ३० साल से गृह युद्ध झेल रहे श्रीलंका से भी ज्यादा है| बाह्य आतंकवाद के नाम पर भी हाय-तौबा मचाने वाला मध्य वर्ग आतंरिक और जरुरी मुद्दों पर मौन क्यों हो जाता है? २० रुपये रोज से कम पर जिंदगी जी रहे इस देश की ६९ % आबादी के लिए जिन्दा रहने के जद्दोजहद सबसे बड़ी समस्या है ना कि आतंकवाद और भ्रष्टाचार| मैं जानता हूँ कि कुछ मानवीय तर्क मध्य वर्गीय लोगों को परेशान कर रही है लेकिन सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता| आतंकवाद के हमले से मरने पर पूरी सभ्य समाज एक मुस्त से मुद्दा उठाकर हाय-तौबा शुरू कर देती है – सरकार निकम्मी, नेता चोर, इसे फाँसी दो इत्यादि...इत्यादि| लेकिन मध्य वर्ग के सबसे बड़े तीर्थ स्थल विश्व बैंक (World Bank) के दिए आंकड़ों पर हाय-तौबा क्यों नहीं मचती है? विश्व बैंक के मशहूर अर्थशास्त्री नैन्सी बेनिसल ने मध्य वर्ग की परिभाषा देते हुए कहा है कि विकाशशील देशों में मध्य वर्ग आबादी का वह हिस्सा जो १० अमेरिकी डौलर प्रतिदिन (करीब ४५० भारतीय रुपये) या १३५०० रुपये प्रतिमाह से ज्यादा  कमाती है पर देश के सबसे धनी ५% लोग हैं जिनके पास इतनी आर्थिक सुरक्षा होती है वही समाज कानून के शासन, अस्थायित्व के बारे में सोच सकें और आतंकवाद जैसे बातों के लिए हाय-तौबा मचाये|

अब जरा सोचिये कि जिस देश में कल के बारे में सोचने की फुर्सत सिर्फ ५% आबादी के पास हो और जहाँ ९५% लोग किसी तरह जिन्दा रहने के लिए जद्दोजहद करता हो, वहां यह बड़ा सवाल उठ खड़ा होता है कि कितने प्रतिशत की समस्या आतंकवाद और भ्रष्टाचार होगी और कितनों की भूख? जिस देश में ५०% ज्यादा लोगों के पास रहने का कोई स्थायी और सुरक्षित घर ना हो, आजीविका के साधन के बतौर कोई जमीन न हो, जिस देश के ६०% से ज्यादा आबादी के पास किसी किस्म की स्वास्थ्य सुविधा नही पहुंची हो, वहां आतंकवाद और आर्थिक भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा कैसे बन जाता है? आतंकवाद और भ्रष्टाचार निश्चित तौर पर बहुत गंभीर मुद्दा है परन्तु इससे भी गंभीर घटना वर्षों से अपने हालात पर रोना रोती रही है| अनिश्चितता के भावना से घिरे हुए, कुशासन से प्रभावित रहते हुए और जनता में असुरक्षा की भावना होने के बावजूद आतंकी गतिविधियों और अंदरूनी विद्रोही घटनाओं में गिरावट आई है| लगातार ९ वें साल में भी आतंकी और अंदरूनी विद्रोही घटनाओं में मरने वालो की संख्या में गिरावट आई है| जबकि २०१० में १९०२ मौतों का पंजीकरण किया गया, इससे साफ़ जाहिर होता है कि आतंकवाद की स्थिति में कमी आई है|

सबसे ज्यादा और तेजी से भारत में जो स्थिति बिगरी है वह है माओवादी उग्रवाद, मुख्य रूप से कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व द्वारा माओवादी, कई तरह के विद्रोही आन्दोलन ने काफी कमजोर किया| भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में जिस तरीके से आतंरिक विद्रोही समूह, क्षेत्रीय, पार्टी, नेता, कार्यकर्ता, विद्रोही गुट एक महत्वपूर्ण क्षमता के रूप में उभरी है| उसे भी नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता| यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असाम (उल्फा), नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल, नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड, पूर्वोत्तर उग्रवादी समूह आई.एम.के. इशाक मुइवा और एन.एच.सी.एन. के खापयंक गुटों में शामिल एन.डी.एफ.बी., नुनिशिया गुट दिशालिन, यूनाइटेड पीपल्स डेमोक्रेटिक एकात्मकता (यु.पी.डी.एस.), कारबी लोंगरी उत्तरी कछाड हिल्स लिबरेशन फ्रंट (के.एल.एन.एफ.), राष्ट्रिय स्वयं सेवक अचिक (परिषद ए.एन.वी.सी.), कुकी नेशनल संगठन (के.एन.ओ.) और यूनाइटेड पीपल्स फ्रंट (यु.पी.एफ.) जैसे संगठन ने भी भारत को काफी कमजोर किया| ६७ से अधिक विद्रोही संगठन लगातार हिंसक गतिविधि करते रहे, जिसके कारण भारतीय सामाजिक, राजनैतिक, अर्थव्यवस्था प्रभावित रही| भारत की बहुसंख्यक राज्य पूर्ण रूप से आतंरिक आतंकवाद से प्रभावित है| आखिर क्या कारण है?

मध्य वर्गीय सभ्य समाज और लेखकों को इन मुद्दों को लेकर के गंभीर दिलचस्पी दिखाई नहीं पड़ी? क्यों देश के सभ्य समाज और लेखक को नहीं सूझती जिनके कारण आज आतंरिक आतंकवाद और बुराइयां हमारे देश को खोखला कर रही हैं| कौन सी ऐसी परिस्थिति उतपन्न हुयी है कई वर्षों से, जिससे हमारे देश के ही हमारे समाज के हमारे भाई आज हमसे अलगाव की बात करते हैं? अपना देश, अपना राज्य, अपनी स्वतंत्रा की बात करते हैं? निश्चित रूप से हमारी व्यवस्था में दोष हैं| अन्यथा हमारा ही भाई अपने देश को कमजोर क्यों करेगा? आज ये सबसे महत्वपूर्ण गंभीर विषय है जिस पर बहस होनी चाहिए कि कैसे हम आतंरिक मुद्दों को सुलझा सकें|



मैंने जो अनुभव किया है उसमे असफल अर्थ व्यवस्था, राजनैतिक लोकाचार विशेष रूप से सुरक्षा और न्याय प्रशासन, संस्कृति और भ्रष्टाचार और भारत के भीतर ही असमान्य समानता, विषमता का फर्क होना, यह सबसे बड़ा कारण है| आतंकवाद जैसी घटनाओं के साथ-साथ भारत के कुछ गंभीर घटनाओं पर भी लेखकों और मीडिया को हाय-तौबा मचाना चाहिए| आज देश के लिए सबसे गंभीर चिंता का विषय है देश में भूख से लाखों लोगों का मारना| एक नज़र आप पढ़े-लिखे लोग इन सरकारी आकड़ों पर भी ध्यान दें! यह एक सरकारी आंकड़ा है, हकीकत इससे और भी ज्यादा खतरनाक है, जो सरकार या किसी वर्ल्ड बैंक के आंकड़े में नहीं है लेकिन सरकारी आंकड़े ही काफी है दिल दहला देने के लिए|

१.      विश्व के एक तिहाई भूखे लोग भारत में रहते हैं|
२.      ८३ करोड़ ६० लाख भारतीय २० रुपये रोजाना से भी कम पर जीते हैं, जो कि आधे डौलर से भी कम है|
३.      प्रत्येक रात २० करोड़ भारतीय भूखे सोते हैं|
४.      भारत में २१ करोड़ २० लाख लोग कुपोषण के शिकार हैं|
५.      प्रत्येक दिन ७ हज़ार भारतीय भूख से मरते हैं|
६.      आज़ादी के बाद स्वास्थ्य के क्षेत्र में नाम मात्र के सुधार और हाल ही के सालों में ८% के ग्रोथ रेट के वाबजूद लगभग ५०% भारतीय बच्चों का कम वजन का होना और ७०% से ज्यादा महिलाओं एवं बच्चों में कुपोषण संबंधित गंभीर बिमारियों जैसे अनीमिया का होना, के कारण भारत में कुपोषण के कारण खामोश-आपातकाल की स्थिति बनी हुई है|
७.      २००६-०७ के बीच ७० लाख भारतीय बच्चे कुपोषण के कारण मरे थे (एक साल से कम उम्र के लगभग २० लाख बच्चे)|
८.      ३०% जन्मे बच्चों का वजन जन्म के समय उचित वजन से काफी कम होता है|
९.      ५६% शादी-शुदा महिलाएं अनीमिया से ग्रसित हैं और ७९% छ: से पैंतीस महीने के बच्चे अनीमिया से ग्रसित हैं|
१०.  भारत में भूखे लोगों की संख्या सरकारी आंकड़े के मुताबिक गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या से हमेशा ज्यादा रही है (१९९३-९४ में ३७ % ग्रामीण परिवार गरीबी रेखा के निचे थे जबकि ८० % परिवार कुपोषण का शिकार था)|
११.  बी.बी.सी के सर्वे के मुताबिक विश्व के एक चौथाई गरीब भारत में रहते हैं और १५ करोड़ लोग झुग्गी-झोपड़ी में रहते हैं|
१२.  पगडंडियों, सड़कों के किनारे, रैन बसेरों और खुले असमान के निचे ५०% मुंबईवासी सोते हैं|
१३.  एक तिहाई भारतीय आबादी गरीबी रेखा के नीचे रहती है|
१४.  भारत में २०८३ लोगों के लिए मात्र एक ही डॉक्टर की सुविधा है|
१५.  ५ साल से कम उम्र के एक हज़ार बच्चों में से २१८ की मौत हो जाती है|
१६.  भारत में २ लाख बच्चे हर महीने मरते हैं|
१७.  भारत में साढ़े चार लाख लोग सिर्फ टी.बी. जैसी बीमारी के कारण मरते हैं|
१८.  पिछले २० साल में गर्भपात एवं लिंगभेद करके एक करोड़ लड़कियों को मार दिया गया|
१९.  प्रत्येक साल गर्भपात से ५ लाख लड़कियों मार दिया जाता है|
२०.  १९०० से २००७ तक आये प्राकृतिक आपदाओं जैसे ज्वालामुखी विस्फोट, बाढ़, भूकंप, सुनामी, बवंडर आदि से भारत में ९१ लाख ८ हज़ार ६ सौ ९ जाने गईं|
२१.  भारत में प्रत्येक साल सड़क दुर्घटना में २ लाख ३० हज़ार (दुनिया में सबसे ज्यादा) लोग जान गंवाते हैं, इस मामले में भारत ने चीन को भी पीछे छोड़ दिया|
२२.  भारत में दुनिया की मात्र १% ही कारें हैं लेकिन दुनिया की १०% कार दुर्घटना भारत में ही घटती हैं|
२३.  भारत में कानून और नियम की कमजोरी के कारण तेज रफ़्तार से गाड़ी चलाना, हेलमेट, सीट बेल्ट का इस्तेमाल नहीं करना और नशे में गाड़ी चलाना सबसे बड़ा दुर्घटना का कारण है|
२४.  ट्रेन दुर्घटना में मरने वालों की संख्या २००० से ५००० के बीच है|
२५.  प्रत्येक तीन में से एक भारतीय को प्राथमिक शिक्षा नहीं मिलती|

ये सभी आंकड़े निम्न श्रोतों ले लिए गए हैं:

UN World Food Programme UN World Health Organization: Global Database on Child
National Commission for Enterprises in the Unorganized Sector
National Family Health Survey 2005 A- 06 (NFHS-3) (India)
Centre for Environment and Food Security (India)
Rural 21 (India)


अब सवाल उठता है कि देश में कब इन बहुसंख्यक लोगों के समस्याओं के लिए सभ्य समाज के लोग जागृत होंगे? कब सक्रियता आएगी? एक साल में आतंकवाद से मरने वालों की संख्या ज्यादा से ज्यादा ६०० से ७०० है लेकिन भूख से मरने वालों की संख्या २५ लाख से ज्यादा है| बीमारी से मरने वालों की संख्या लाखों-लाख| कई तरह से प्रकोप, परिस्थिति, प्रकृति, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था के के कारण लाखों लोग मरते हैं, इनपर हाय-तौबा क्यों नहीं मचती? क्योंकि इन मौतों की जिम्मेवार हाय-तौबा मचाने वाली पढ़े-लिखे सभ्य समाज ही हैं| इस देश के कई हिंदू, मुस्लमान, सिक्ख, ईसाई आतंरिक रूप से आतंकवाद जैसे कायरनामा हरकत से सख्त खिलाफ हैं| सभी चाहते हैं कि भारत, समृद्ध, खुशहाल और ताकतवर हो| यह भी सच है कि हजारों-हज़ार आतंकवादी दुनिया की कोई बाह्य ताकत या कोई व्यक्ति चाह कर भी भारत की एकता, संप्रभुता और हमारी धर्मनिर्पेक्ष विचारधाराओं को खत्म नहीं कर सकता| जो लोग आज आतंकवाद के नाम पर सिर्फ अपनी निजी राजनीती और सामाजिक स्वार्थ के लिए हाय-तौबा मचा रहे हैं, जिन्हें लगता है कि ऐसी संवेदनशील मुद्दों को लोगों के बीच लाकर अपने स्वार्थ की पूर्ति कर सकें, ऐसे ही मुट्ठी भर लोग इस तरह के संवेदनशील मुद्दों को ही चुनकर देश के मौलिक समस्याओं को हमेशा से दरकिनार करती रही है|

आम लोगों का ध्यान उस ओर जाने ही नहीं दिया गया, जिससे मनुष्य और सम्पूर्ण राष्ट्र खुशहाल हो सके| हमारे पास उर्जा है ५५ करोड़ युवाओं की, देश को आत्मनिर्भर बनाने वाले किसान की, मजदूर की, लेकिन एक बड़ी चुनौती है हमारे सामने, कैसे इस विशाल क्षमता का उपयोग हो? इस ताकत को आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक रूप से मजबूत कर आतंकवाद और आंतरिक आतंकवाद जैसे चुनौती को हम बहुत कम कर सकते हैं, रोक सकते हैं| जरूरत है भारत के इस उर्जा को समृद्ध करने की| सरकार को ध्यान देना होगा इन उर्जा की ओर ताकि इस उर्जा के भीतर त्याग करने का और देने का बोध पैदा हो सके, सूरज के तरह|

कभी सूरज पृथ्वी से नहीं कहता कि मेरा शुक्रगुजार रहो, मुझे कुछ वापस दो| बिना किसी उम्मीद के जिंदगी देता रहता है| जिस तरह सूरज के रुकने से उसकी रौशनी खत्म हो जायेगी, आज इसी कारण से भारत के ५५ करोड़ नौजवानों के भीतर की उर्जा के अभाव के कारण भारत के रौशनी मंद पड़ी है| ना तो ५५ करोड़ युवा के आत्मा को शांति मिलती है और ना ही भारत खुशहाल हो पाता है| उर्जा के भाव से ही बदले की भावना खत्म होगी| नैतिक उर्जा से ही सामाजिक बदलाव, अखंडता के साथ काम करने और अखंडता से जीतने का बोध पैदा होगा|

आतंकवाद और आतंरिक आतंकवाद को यदि रोकना है तो सामाजिक असंतुलन, हिंसा, भ्रष्टाचार जैसे समस्याओं का निदान आत्मा और जिंदगी के आतंरिक नैतिक बदलाव के कारण ही संभव है| उर्जा के भाव से ही उत्सर्जित, प्रेरित युवाओं का जन्म होगा| तभी सही दिशा से राष्ट्र के युवाओं के द्वारा किसी भी तरह के आन्दोलन को संचालित किया जा सकता है|

मेरा व्यक्तिगत विचार है कि सरकार किसान, युवा, मजदूरों को उर्जावान बनाने के लिए एक कानून बनाये जो सम्पूर्ण रूप से एक समूह की तरक्की के लिए काम करे| सरकार इस बात पर भी ध्यान दे कि जो कठोर और सक्षम कानून हमारे संविधान में हैं उस पर मजबूती से अमल करते हुए बिना किसी भय, लोभ के ठोस निर्णय ले|

समाज में आज दो तरह का माहौल है| मध्य वर्गीय और पढ़े-लिखे लोग सोचते हैं कि जब हम सरकार बनाने तक से लेकर समाज की सभ्यता, संस्कृति, किसी भी तरह की विचारधारा को माहौल बनाने की ठिकेदारी जब हम समूह के पास है, तो मैं सुरक्षित हूँ| बहुसंख्यक लोग सोचते हैं कि सरकार किसी की भी हो, तब भी हम विदेशी अंग्रेजों के गुलाम थे और आज भी हम अपने ही भाइयों, समाज के ठीकेदार, मुट्ठी भर लोगों के गुलाम हैं- हमारी जिंदगी का हाल तो वैसा का वैसा ही रहेगा| बहुसंख्यक लोग रोटी, कपड़ा, मकान, सड़क, बिजली, पानी, से आज भी आज़ादी के ६३ साल बाद, वंचित हैं| वे सरकार के भरोसे नहीं बल्कि अपने भाग्य, किस्मत और भगवान के भरोसे जी रहे हैं, और पढ़ी-लिखी समाज अपनी काबिलियत, चालाकी, दौलत, ज्ञान और सरकार के भरोसे जीते हैं, लेकिन अविश्वास का भाव दोनों समूह के बीच है| सरकार को इस अविश्वास के भाव को खत्म करना होगा और सभ्य समाज को भारत के ५५ करोड़ युवा तथा किसान, मजदूर के उर्जा के लिए भी आन्दोलन करना होगा|