Friday, 18 May 2012

पप्पू यादव: 'धर्मात्मा' बनने की कोशिश में 'डॉन'


पप्पू यादव: 'धर्मात्मा' बनने की कोशिश में 'डॉन'

आमतौर पर उनके दिन की शुरुआत सुबह साढ़े पांच बजे हो जाती है. सबसे पहले वे ध्यान लगाते हैं और फिर अखबारों एवं किताबों के गहन अध्ययन में घंटों गुजार देते हैं. उनका वजन 175 से 150 किलो पर आ गया है. चार बार सांसद रह चुके इस शख्स की एक समय पूर्वी बिहार में तूती बोला करती थी.

बाहुबली राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव अब पूरी तरह से बदले हुए इंसान नजर आते हैं. वे नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी से समाजशास्त्र में एमए कर रहे हैं और 2012 में बेऊर जेल से एमए की परीक्षा देने वाले एकमात्र कैदी हैं. पप्पू यादव की इन दिनों प्रथम वर्ष की परीक्षा चल रही है. वे जेल में ही अपनी कोठरी से परीक्षा दे रहे हैं. परीक्षा देते समय, एक इंविजिलेटर की मौजूदगी में पप्पू यादव उत्तर पुस्तिका के सारे पन्ने भरने की जी-तोड़ कोशिश करते हैं.



पप्पू ने जब लोकसभा में पूर्णिया और मधेपुरा सीटों का चार बार प्रतिनिधित्व किया था, तब वे सिर्फ इंटरमीडिएट पास हुआ करते थे. बाद में, तिहाड़ जेल में रहते हुए उन्होंने मानव अधिकार और आपदा प्रबंधन में डिग्री हासिल की. अब उनका ख्वाब आगे चलकर पीएचडी करना है.

अगस्त, 2010 में जमानत रद्द होने और फिर गुड़गांव के एक अस्पताल से गिरफ्तार किए जाने के बाद से यह 46 वर्षीय बाहुबली पटना की बेऊर सेंट्रल जेल में बंद है. सीपीआइ-एम के विधायक अजीत सरकार की जून, 1998 में हुई हत्या की साजिश रचने के लिए पप्पू यादव को फरवरी 2008 में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी. इस सजा के चलते वे चुनाव लड़ने के अधिकार से पहले ही वंचित हो चुके हैं.

मई, 1999 में पहली बार गिरफ्तार हुए  पप्पू यादव एक दशक से ज्‍यादा समय सलाखों के पीछे गुजार चुके हैं. अब ऐसा लगता है कि उनकी अंतरात्मा की आवाज उस पप्पू यादव पर हावी हो चुकी है, जो एक दौर में बेखौफ और बेताज बादशाह हुआ करता था.
पप्पू यादव अपनी आत्मकथा लिख रहे हैं, जिसका शीर्षक अभी तय नहीं है. जिसने भी उन्हें डायरी लिखते हुए देखा है, उसका यही कहना है कि यह आत्मकथा काफी भारी-भरकम होगी. सवाल यह है कि पप्पू को यह एहसास कब हुआ कि उनकी कलम उनकी तलवार से कहीं ज्‍यादा ताकतवर है?

जेल में उनके एक साथी बताते हैं, ''आत्मकथा लिखना अपनी प्रतिष्ठा दोबारा हासिल करने के लिए है क्योंकि पप्पू सोचते हैं कि अब उन्हें सिर्फ अपने लेखन और शैक्षणिक योग्यता के बूते ही समाज में सम्मान मिल सकता है.'' बेऊर जेल में सजा काट रहे पप्पू अध्ययन, परोपकार, वेब स्तंभ लेखन और कई अन्य सकारात्मक चीजों में शामिल हैं, जो आम तौर पर उनकी पहचान नहीं रही हैं. वे पहली बार 1990 में 25 वर्ष की उम्र में निर्दलीय विधायक बने थे.

जून, 2011 में जब पटना पुलिस ने बेऊर सेंट्रल जेल पहुंच कर पप्पू यादव की कोठरी पर अचानक छापा मारा था, तो यह पूर्व सांसद कुछ लिखता हुआ मिला था. पप्पू यादव की छवि वाले इंसान और उस पर भी जब वह जेल में रह रहा हो, के लिए यह एक बेहद असामान्य बात थी. हो सकता है पप्पू यादव को अपनी लेखन शैली में कुछ सुधार करने की जरूरत हो लेकिन वह अपनी छवि के साथ चस्पां दाग को छुड़ाने की पुरजोर कोशिशों में लगे हैं और अपनी आत्मकथा का एक-चौथाई हिस्सा पहले ही खत्म कर चुके हैं.
जेलों में उनका पिछला सफर अलग तरह का था. सितंबर 2004 में, पप्पू ने अपनी जमानत का जश्न मनाने के लिए बेऊर जेल में कैदियों को एक भव्य पार्टी दी थी. उसी साल, उसने जेलों से कोई 670 बार फोन लगाया था और इनमें से कुछ नंबर बिहार के मंत्रियों के भी थे. दिसंबर, 2004 में पप्पू जेल में समर्थकों का दरबार लगाते हुए पकड़े गए थे, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें दिल्ली की तिहाड़ जेल भेजने का आदेश दिया था. अभी तक बेऊर जेल में उनकी मौजूदगी कुछ खास घटनात्मक नहीं रही है.

खुद को अपने अतीत से बाहर लाने की पप्पू की इस कवायद ने उन्हें दूसरों की भलाई करने के लिए भी प्रेरित किया है. पिछले साल उनके संगठन युवा शक्ति के कार्यकर्ताओं ने एक प्रतिभाशाली गायिका अंशुमाला की किडनी के प्रत्यारोपण के लिए 6 लाख रु. जुटाए थे. अंशुमाला को उसके ससुरालवालों ने छोड़ दिया था.

मुसीबत में फंसे लोगों की मदद करने के पप्पू यादव के कई उदाहरणों में से यह सिर्फ एक है. कार्यकर्ताओं के योगदान के अलावा, पप्पू की पूर्व सांसद पत्नी रंजीता रंजन और पांच बहनें, उनकी दूसरों की भलाई करने की हसरतों को पूरा करते रहने के लिए अपने संसाधनों को झोंकती रहती हैं. पप्पू और उनकी पत्नी ने कुछ स्कूल और व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र भी स्थापित किए हैं, जहां गरीबों को रियायती दरों पर शिक्षा मिलती है.
बेऊर जेल की लाइब्रेरी में जितने भी अखबार मंगाए जाते हैं, पप्पू उन सब का अध्ययन करते हैं. वे गरीबों के हालात बयान करने वाले समाचारों के नोट्स बनाते हैं. हर सप्ताह, व्यक्तिगत कूरियर इन सिफारशी नोट्स को रंजीता रंजन तक पहुंचाता है. पप्पू ने पत्नी को जेल आने की मनाही कर रखी है.

यह जाहिर तौर पर उस शख्स के लिए बड़ा बदलाव है, जो अतीत में खतरनाक डॉन हुआ करता था. पप्पू के नाम का एक समय बिहार में भारी दबदबा था. नब्बे के दशक में जब अपराधी से नेता बनने वालों की छवि आसमान छूने लगी थी, पप्पू यादव तब बड़ी आसानी से हर ओर दबंगई दिखा रहे थे और लोगों को अपनी इच्छा के आगे झुकाते जा रहे थे.

इस अतीत की एकमात्र खास बात उनका खुद को रॉबिनहुड की छवि में ढालना था. अपने दबदबे के बूते, पप्पू प्रशासन को लोक-लुभावन नीतियां अपनाने के लिए मजबूर करने में सफल हो जाया करते थे. उन दिनों उनके निर्वाचन क्षेत्र में शायद ही कभी बिजली कटौती हुई हो. अपने उभार के दिनों में, पप्पू डॉक्टरों से गरीबों का मुफ्त इलाज करवाते थे, भ्रष्ट अफसरशाह उनके डर से कांपते रहते थे. वे उन खांटी जातिगत मठाधीशों के लिए भी एक मानक थे, जिन्हें बिहार के खंडित समाज ने राजनीति के केंद्र पर पहुंचा दिया था. अपने निर्वाचन क्षेत्र से संबंधित मुद्दों पर अक्सर अंतिम फैसला उन्हीं का होता था.

सीपीआइ-एम के विधायक अजित सरकार की हत्या के सिलसिले में मई, 1999 में गिरफ्तार किए जाने के बाद से पप्पू लगभग जेल में ही रहे हैं. उन्हें तीन बार जमानत मिली थी और तीनों बार सुप्रीम कोर्ट ने इसे फौरन रद्द करके उन्हें वापस जेल भेज दिया.
सीपीआइ-एम के चार बार विधायक रहे सरकार का पूर्णिया में अच्छा-खासा जनाधार था, पप्पू यादव को भी राजनैतिक ख्याति की बुलंदियों तक ले जाने वाला पूर्णिया ही था. एक विशेष अदालत में दाखिल सीबीआइ की चार्जशीट में कहा गया है कि अजित सरकार का खात्मा इसलिए करवाया गया था, क्योंकि उन्होंने 1998 के लोकसभा चुनाव में पप्पू यादव की चुनावी हार सुनिश्चित कराई थी. पप्पू को सजा सीबीआइ की इसी चार्जशीट ने दिलवाई थी. हालांकि पप्पू ने इस सजा के खिलाफ अपील कर रखी है.

पप्पू का खराब समय फरवरी 2008 में तब शुरू हुआ, जब सीबीआइ की विशेष अदालत ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई. मौज भरे दिनों के दोस्त पप्पू से किनारा कर गए. जल्द ही, वह गहरे आत्ममंथन की हालत में पहुंच गए और उन्हें एहसास हो गया कि उनके जीवन में सुधार की सख्त जरूरत है. पप्पू का दावा है कि उन्होंने जितने पाप किए हैं, उससे अधिक पाप उनके खिलाफ किए गए हैं; लेकिन उन्हें अब किसी के खिलाफ कोई शिकायत शायद ही हो.

जेल में अपने लंबे दौर में पप्पू बाहर से विनम्र और मृदुभाषी बने रहे. यही वह गुण है, जो उनके साथ तब से है, जब उनकी तूती बोला करती थी. लेकिन इस सारे आत्ममंथन के बावजूद कुछ बातों ने अब भी पप्पू यादव का पीछा नहीं छोड़ा है. अतीत की काली परछाइयां अब भी उनकी स्मृतियों पर मंडरा रही हैं. जिनके चलते वे बेचैन रहते हैं और नींद न आने की बीमारी से ग्रस्त हो चुके हैं. वह दिन में चार घंटे से ज्‍यादा मुश्किल से ही सो पाते हैं.

पिछले दो साल से वे बेऊर जेल में हैं और इतना ही समय उन्हें अपने बड़े होते बच्चों से मिले हुए हो गया है. वे नहीं चाहते कि उनके बच्चे उन्हें जेल में देखें. उनकी छह साल की बेटी को यह तक नहीं पता कि वे जेल में हैं. पप्पू इस पर इतना ही कहते हैं, ''भगवान दुश्मन को भी कभी ये दिन न दिखाए''.

Monday, 26 March 2012

सियासत


सियासत

मि. ओबामा का कॉल आया, फुद्नी झटपट फोन उठाया |
हेल्लो मिस्टर! कहो क्या हाल है – शताब्दी वर्ष में कैसा बिहार है ?
सुनते हैं काफी विकास हुए हैं – भ्रष्टाचारी पूर्णत: नाश हुए है ?

भाई जान! सब प्रचार का खेला है – कागज़ी घोड़े का मस्त मेला है |
हाँ, बिहार बेहिसाब बदला है – माय से महादलित तक चला है |
आज भी शौहर पंजाब जा रहे हैं - मनरेगा का पैसा बिचौलिए खा रहे हैं |

नो मिस्टर, यहाँ प्रामाणिक सत्यापन है

भईया, सब बकवास, केवल विज्ञापन है |
मजदूर के वेतन में नियोजित हैं शिक्षक,
पहले बहाली उसके बाद प्रशिक्षण |
परीक्षा के पूर्व उपलब्ध है प्रश्न,
पैसेवालों की मौज-मस्ती-जश्न |

अंत्योदय पर कुछ विशेष सुनाओ,
बिहारी प्रयोग का रहस्य बताओ !

रहस्य नहीं सब-कुछ साफ़ है
बेटा हरियाणा, घर में बाप है |
खून – पसीने से पेट पर विजय है –
सिर्फ आंकड़ों में ही अंत्योदय है |

बाढ़ की कैसी दिशा – दशा है
पुनर्वास हुए – कुछ अता-पता है |

बाढ़ सरकारी योजना का हिस्सा है –
नेता-ठीकेदार गठजोड़ का किस्सा है |
भला निदान से पत्नियां रूठ जावेगी –
किलो भर गहना कहाँ से लावेगी ?
समस्या को समस्या बनाये रखना
सफेदपोशों का वार्षिक धर्म है –
जिल्लत की जिंदगी जीती जनता,
व्यवस्था – बेहया-बेशर्म है |
तुम भी लूटो, हम भी लूटें, मिल जुलकर खेलें खेल –
अधिकारी हों मालामाल – एक-आध को जाने दो जेल |

साक्षरता दर तो बहुत बढ़ा है,
बिहार इसमें इतिहास गढा है ?

भईया! इतिहास हमारी विरासत है,
बिहार चंद्रगुप्त की रियासत है |
किसान त्रस्त हैं – गाँव-गाँव में
गर्व से कहो – “यही सियासत है |”

Sunday, 18 March 2012

क्रोध का विसर्जन


आज का युग प्रबंधन पर बहुत जोर देता है, प्रसंग चाहे आपसी रिश्ते का हो, अर्थव्यवस्था, प्रशासन, आपदा या व्यवसाय का, हमारे यहाँ जीवन के हर पहलू को सुचारू रूप से साधने के लिए एक नायब प्रबंधन ग्रन्थ है| कोई भी समस्या हो, उसकी शरण में जाकर मार्ग खुलता नज़र आता है| मेरा मतलब गीता से है| जिसमें काम, क्रोध और लोभ को नर्क का द्वार कहा गया है| यही असुरी प्रवृतियाँ भी हैं| जिनसे मुक्ति का एकमात्र उपाय है – संयम| आज का विचारक इसे दमन कहकर ख़ारिज कर देता है| परन्तु संयम का निरंतर अभ्यास करने से स्वभाव में सहज ही मनचाही दशा प्राप्त हो सकती है| यूँ तो प्रत्येक व्यक्ति के मन की स्थिति, परिवेश और कारण विशिष्ट होते हैं| समाधान के अलग रास्ते तलाशने पड़ते हैं| परन्तु समस्या की मूलभूत समानता के कारण सामान्य रूप से भी विचार किया जा सकता है| सबसे पहला कदम है, अपनी कमजोरियों को पहचान कर स्वीकार करना| उससे मुक्त होने की इच्छा दूसरी सीढ़ी है| क्रोधी को अपनी प्रतिक्रिया सदा संगत लगती है| दूसरे उसकी उपेक्षा करते हैं| उसकी बात को महत्व नहीं देते हैं| इससे उसकी प्रतिष्ठा को धक्का लगता है| क्रोध का विसर्जन करने के लिए स्वयं को मथना पड़ेगा| आवेश के कारणों को रेखांकित करके मुख्य बिंदुओं पर ऊँगली रखनी होगी|


मुझे किस बात पर किस स्थिति में गुस्सा आता है? पूरे इमानदारी से बिना अपने को छूट दिए निर्मम भाव से आत्मविश्लेषण करना होगा| क्या हम दूसरे के दृष्टिकोण को समझने की कोशिश करते हैं? हर इंसान की सोंच को सम्मान देना जरुरी है| यह समझ सभी रिश्तों और परिस्थितियों पर लागू होती है|

विरोधी पक्ष के प्रति द्वेष, घृणा भाव के स्थान पर मन में संवेदना लाने की कोशिश से दूसरों की पीड़ा के अनुभव की ताकत आती है| अपने बच्चों से, साथी से, मित्रों या अफसर से उम्मीदें रखना और फिर उनकी पूर्ति न होने पर नाराजगी, क्रोध का कारण बनता है| ऐसी स्थिति में अपेक्षा के हित होना या प्रत्युपकार की भावना से मुक्त रहने का अभ्यास करना आवश्यक है| अपनी आलोचना सुनकर शांत रहना बहुत कठिन है| परन्तु सहनशीलता की प्रवृति का विकास आलोचना में भी अपने लिए सुधार के बिंदु खोज लेता है|

क्षमा की शक्ति का मतलब है घृणा, विरोध, बदले की भावना से मुक्त होने की ताकत| मानसिक शांति के लिए क्षमा कर पाना महत्वपूर्ण साधन है| गलती करने वाला और उदंड हो जाएगा इसलिए क्रोध को पोसे रखना अपनी ही हानि कारण है| क्षमा दोनों पक्षों के घाव को भरता है| क्रोध के पहली चिंगारी को फूटते ही अपने को सावधान करो – ‘बस’ और नहीं, शांत हो जाओ! शांति! शांति! शीशे में देखकर अपनी मुस्कुराते छवि को निहारें और दिन भर वही छवि बनायें रखें! चेहरे पर झुंझलाहट तनाव के हार्मोन्स पैदा करते हैं और मुस्कराहट उनमे कटौती करती हैं|

Monday, 27 February 2012

प्रेम ही धर्म का सार है


नीत्शे ने करीब १५० वर्ष पहले कहा था कि दुनिया के हर कोने में यह खबर फैला दी जाए कि ईश्वर का अस्तित्व खत्म हो गया है तो, तो भले ही ऐसा ना हुआ हो, लेकिन मानवता अवश्य ही मृत्यु की ओर अग्रसर हो जाएगा| कहते भी हैं कि जो समाज ईश्वर से अपना संबंध तोड़ लेता है, वह ज्यादा दिन जिन्दा नहीं रह सकता| जिस समाज की जड़ ही यदि खत्म हो जाए, वह ज्यादा दिन ज़िंदा रह भी कैसे सकता है| ओशो कहते हैं, “जो लोग धर्म से संबंध तोड़ लेते हैं, उनके भीतर सिवाय दुःख के कुछ नहीं रहता और जो स्वयं दुखी हो, वह दूसरे को सुख क्या देगा|”

धर्म का संबंध परलोक से उतना नहीं है, स्वर्ग और नर्क की अवधारणा से उतना नहीं है, ईश्वर में विश्वास-अविश्वास से भी उतना नहीं है, जितना कि मनुष्य के भीतर शांतिपूर्ण संगीत को उत्पन्न करने से है| धर्म एक वैज्ञानिक पद्धति है जिसके द्वारा मनुष्य आतंरिक स्वास्थ्य पाता है| धर्म का संबंध हिंदुत्व, इस्लाम या ईसाइयत से नहीं है|

धर्म एक व्यक्तिगत उपलब्धी है, जिसे माता-पिता से नहीं पाया जा सकता बल्कि इसे स्वयं ही साधना होता है| नामों के कारण जो बंटवारा होता है, उसके वजह से वास्तविक धर्म की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता| यह धर्म कोई विशेषण वाला धर्म नहीं है, धर्म की स्वीकृति इस बात से शुरू होती है कि हम इस तथ्य पर विचार कर लें कि मनुष्य पैदाइश से ही पूर्ण नहीं है, अधूरा है| मनुष्य को स्वयं ही अपने सभी संभावनाओं को विकसित करना होता है, और तब यह हो सकता है कि मनुष्य के भीतर ठीक अर्थों में मनुष्य का जन्म हो| एक जन्म माता-पिता से मिलता है और दूसरा जन्म धर्म से मिलता है|



ओशो के अनुसार, धर्म के विचार की शुरुआत इस भावना, इस दृष्टि से होती है कि हम समझें कि हम जैसे हैं, वही पर्याप्त नहीं है| जो लोग अपनी प्राकृतिक स्थिति से तृप्त हो जाते हैं, वे कभी विकास नहीं कर सकते| धर्म एक गहरी अतृप्ति है, एक दिव्य प्यास और असंतोष है| कुछ लोग कहते हैं कि धर्म संतोष सिखाता है, लेकिन संतोष नहीं सिखाता| इसलिए धर्म की शुरुआत हमेशा एक आतंरिक असंतोष से होती है और यह असंतोष इस विचार से पैदा होता है कि हम जैसे भी हैं, वही हमारी नियति नहीं है| मनुष्य अपनी इस नियति का अतिक्रमण कर सकता है, अशांत है तो शांत हो सकता है, दुखी है तो आनन्द को पा सकता है, अंधकार में है तो प्रकाश में आ सकता है| कैसे दुःख आनंद में परिणत होगा, कैसे अशांति शांति में बदलेगी, कैसे अंधकार प्रकाश बनेगा, कैसे अराजकता में संगीत पैदा होगी, इसी वैज्ञानिक पद्धति का नाम धर्म है| ऐसे धर्म का संबंध किसी अंधविश्वास से नहीं होगा|

यह प्रेम का धर्म होगा, विवेक का धर्म होगा और ऐसा तब होगा जब भीतर के चक्षु खुल जाएंगे और जिस व्यक्ति के अंतस चक्षु खुल जाएंगे, उसे प्रेम का विस्तार करना होगा, फैलाना होगा उसे| प्रेम के विस्तार का नाम ही अहिंसा और करुणा है| तो इस धर्म का पहला सूत्र है, प्रेम का प्रकृति में विस्तार| दूसरा सूत्र है, प्रेम का समाज में विस्तार| प्रेम हम सब करते हैं, लेकिन एक दायरे में करते हैं और संस्थाबद्ध धर्म के तथाकथित धार्मिक लोग हमेशा प्रेम का विरोध करते हैं| लेकिन कोई धार्मिक व्यक्ति प्रेम का विरोध कैसे कर सकता है? उसे तो प्रेम के विस्तार की बात करनी चाहिए! उसे प्रेम के उस दायरे तो तोड़ने की बात करनी चाहिए जिसमें हम बंधे हैं| यही तो धर्म का सार है|

Tuesday, 21 February 2012

प्रेम और एकता


प्रकृति का प्रत्येक कृत्य – प्रेम और एकता पर आधारित है| यह स्वयं में अगाध प्रेम की नीधि है| इसलिए इसका प्रकोप अस्वभाविक है| प्रकृति स्वयं ‘प्रेम’ का पाठ सिखाती है| इसका क्रोध नकारात्मक भाव का परिणाम है| जीवन का स्वास्थ्य विज्ञान – प्रेम रसायन के अनुपात पर आधारित है| प्रेम के अतिरिक्त कोई अन्य विषय समर्थ नहीं हो सकता| इसे भलीभाँति समझने की आवश्यकता है और समझाने की भी| जीवन का हर प्रकोष्ठ – प्रेम का अद्भुत स्वरुप मात्र है| घृणा तो प्रेम का ऋणात्मक प्रभाव प्रदर्शित करता है| प्रेम के बीजारोपण में त्रुटि हो सकती है, प्रेम में नहीं| प्रेम का अनुशीलन, भौतिकता की सबसे बड़ी उपलब्धी है, जिसे प्राय: रेखांकित किया जाता है कि ‘प्रेम किया नहीं जाता, हो जाता है’| निश्चय ही यह गहरा भाव है| इसका अर्थ सुस्पष्ट है| कभी-कभी प्रेम बुद्धि को निरस्त करता प्रतीत होता है, लेकिन प्रेम अंधा नहीं होता| यह सहज प्रहरी है, पारस्परिक एकता का| एकता का श्रोत प्रेम है, इसलिए सभी प्राणी प्रेम की चेतनता से हर क्षण बिंधे होते हैं| अपना-पराया भेद ठहरता नहीं| समाज की एकता इसी अपनत्व भाव का संबल है|



दया, परोपकार, भाईचारा, उदारता, सहयोग, सेवा इत्यादि सभी प्रेम के विभिन्न आयाम हैं| सरलता और सज्जनता, इसके चरण हैं| प्रेम को अनेक बार जानने-बुझने की अनिवार्यता होती है| कितने आश्चर्य की बात है कि इस युग में प्राय: पुत्र अपनी माता के प्रेम की अनुभूति करने में भूल करते हैं, लेकिन इसका सही परिणाम आगे मिलता है| प्रेम की भाषा जीवन के लिए अत्यंत सहज है, भले ही पग-पग पर भूल होती रहे| मनुष्य भुलावे में रहना चाहता है, सच्चाई का सामना करने से बचता है| इसलिए आधुनिक काल में यह प्रसंग भर रह गया है, प्रेम नितोहित हो चला है| सबसे अधिक कोई बात कही या सुनी जाती है, तो वह प्रेम है| मानव इसकी नई-नई अवधारणा खोजता रहता है| प्रेम की गहराई सागर से कहीं अधिक और ऊंचाई आकाश से कहीं ज्यादा है|



इस प्रकार से प्रेम का संदेश प्रत्येक मनुष्य के हृदय तक पहुंचना चाहिए| इस सद्कर्म को प्रेरित किया जाये, सद्भाव प्रवाहित हो! एकता की बाधाएं स्वत: दूर हो जाएँगी|

Monday, 20 February 2012

युधिष्ठिर का यज्ञ


कुरुक्षेत्र युद्ध में विजय पाने की खुशी में पांडवों ने राजसूय यज्ञ किया| दूर-दूर से हजारों लोग आये| बड़े पैमाने पर दान दिया गया| यज्ञ समाप्त होने पर चारों तरफ पांडवों की जय-जयकार हो रही थी| तभी एक नेवला आया| उसका आधा शरीर भूरा था और आधा सुनहरा था| वह यज्ञ भूमि पर इधर-उधर लोटने लगा| सभी लोग उसे देखने लगे|

थोड़ी देर बाद नेवला रुका आर बोला, “तुम लोग झूठ कहते हो| यह यज्ञ वैभवशाली नहीं हो सकता| यह अधूरा ही है|”
लोगों ने कहा, “क्या कहते हो? ऐसा महान यज्ञ तो संसार में कभी नहीं हुआ|”
नेवला, “यज्ञ तो वह था, जहाँ लोटने से मेरा आधा शरीर सुनहरा हो गया था|”



लोगों के द्वारा पूछने पर नेवले ने उस घटना का इस प्रकार वर्णन किया:

“दूर एक गाँव में एक दरिद्र ब्राह्मण अपनी पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू के साथ रहता था| कथा कहने से जो थोड़ा-बहुत मिल जाता था, उसी से सभी मिल-जुलकर खाते थे| एक बार उस गाँव में अकाल पड़ गया| लोग दाने-दाने को मोहताज हो गए| कई दिनों तक उस ब्राह्मण परिवार को अन्न नसीब नहीं हुआ| एक दिन कहीं से थोड़ा आटा आया| ब्राह्मण के पुत्रवधू ने रोटी बनाई और चार टुकड़ों में बांटकर थाली लगाया|”

“जैसे ही सभी खाने बैठे कि दरवाज़े पर एक अतिथि आ गए| ब्राह्मण ने अपनी हिस्से की रोटी उस अतिथि को दी, लेकिन उतने ही रोटी खाने से अतिथि का पेट नहीं भरा| तब ब्राह्मण की पत्नी ने भी अपने हिस्से की रोटी अतिथि को दे दी| उसे भी खा चुकने के बाद अतिथि भूखा ही था| तब एक-एक कर बेटे और पुत्रवधू ने भी अपने हिस्से की रोटियां अतिथि को दे दिए| तब कहीं जाकर उस अतिथि का पेट भर पाया| अतिथि आशीष देकर चले गए| उस रात पूरा परिवार भूखा ही रह गया|”

“अतिथि जब भोजन कर रहे थे तो अन्न के कुछ दाने जमीन पर गिर गए थे| मैं उन कणों पर लोटने लगा| उन कणों का जहाँ-जहाँ मेरे शरीरी से स्पर्श हुआ, वहाँ मेरा शरीर सुनहरा हो गया| तब से मैं सारी दुनिया घूमता रहता हूँ कि फिर कहीं वैसा ही यज्ञ हो ताकि मैं अपने शरीर के बचे हिस्से को भी सुनहरा कर सकूँ| लेकिन वैसा वैभवशाली यज्ञ आज तक मुझे देखने को नहीं मिला और मेरा आधा शरीर अभी तक भूरा ही है|”

नेवले का आशय समझकर युधिष्ठिर लज्जित हो गए|